शौर्यवान श्री मानसिंह सोनगरा
( मानसिंह सोनगरा: मेवाड़ के रक्षक और महाराणा प्रताप के पथ-प्रदर्शक)
परिचय
मानसिंह सोनगरा, पाली के प्रसिद्ध शासक और दानवीर अखेराज सोनगरा (रोटे राव) के ज्येष्ठ पुत्र थे।
- सम्बन्ध: वे मेवाड़ की पटरानी महारानी जयवंता बाई के सगे भाई थे। इस नाते वे महाराणा प्रताप के सगे मामा थे।
- पद: पिता अखेराज जी के 1544 ई. में सुमेल गिरी युद्ध में वीरगति पाने के बाद, मानसिंह सोनगरा पाली की गद्दी पर बैठे और सोनगरा चौहानों का नेतृत्व किया।
इतिहास का सबसे बड़ा निर्णय
महाराणा प्रताप का राजतिलक (1572 ई.) मानसिंह सोनगरा के जीवन की सबसे बड़ी घटना 28 फरवरी 1572 की है, जिसने भारत का इतिहास बदल दिया।
- संकट: महाराणा उदयसिंह ने अपनी मृत्यु से पहले अपनी प्रिय रानी धीरबाई के प्रभाव में आकर छोटे पुत्र जगमाल को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। यह राजपूत परंपरा और योग्यता के खिलाफ था।
- मानसिंह का विरोध: गोगुंदा में जब दाह-संस्कार के बाद जगमाल गद्दी पर बैठा, तो वहां उपस्थित सरदारों में असंतोष था, लेकिन कोई बोल नहीं पा रहा था। तब मानसिंह सोनगरा ने आगे आकर मेवाड़ के प्रमुख सामंत रावत कृष्णदास चुंडावत से पूछा— “क्या यह मेवाड़ की परंपरा के अनुकूल है? क्या एक अयोग्य व्यक्ति गद्दी पर बैठेगा और प्रताप जैसा वीर सेवक बनकर रहेगा?”
- क्रांतिकारी कदम: मानसिंह सोनगरा ने निडर होकर जगमाल का हाथ पकड़कर उसे गद्दी से नीचे उतार दिया और कहा, “इस गद्दी पर केवल उसका अधिकार है जो मेवाड़ की रक्षा कर सके।” उन्होंने रावत कृष्णदास के साथ मिलकर प्रताप का राजतिलक किया।
- महत्व: यदि उस दिन मानसिंह सोनगरा ने अपने भांजे (प्रताप) के लिए यह साहस नहीं दिखाया होता, तो शायद इतिहास को महाराणा प्रताप जैसा महानायक नहीं मिलता।
लोहावट का युद्ध और वीरता
मानसिंह सोनगरा केवल कूटनीतिज्ञ नहीं, बल्कि एक भयंकर योद्धा भी थे। मारवाड़ के इतिहास में लोहावट के युद्ध में उनकी भूमिका अहम है।
- संदर्भ: मारवाड़ के राव चंद्रसेन (जो अकबर के विरोधी थे) और उनके भाई मोटा राजा उदयसिंह (जो मुगलों के साथ थे) के बीच युद्ध हुआ।
- मानसिंह की भूमिका: मानसिंह सोनगरा ने अपने सिद्धांतों पर चलते हुए, मुगलों का साथ देने वाले उदयसिंह के बजाय, स्वाभिमानी राव चंद्रसेन का साथ दिया।
- जीवन रक्षा: युद्ध में जब राव चंद्रसेन घिर गए थे, तब मानसिंह सोनगरा ने अपनी जान की बाजी लगाकर चंद्रसेन को सुरक्षित निकाला और अपनी तलवार का जौहर दिखाया।
पाली का पतन और स्वाभिमान
इतिहास का यह पहलू थोड़ा दुखद है, लेकिन सत्य है। मानसिंह सोनगरा के समय में ही पाली पर राठौड़ों का प्रभाव बढ़ने लगा था।
- अंततः मारवाड़ के विस्तार के कारण सोनगरा चौहानों को पाली छोड़ना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी भी मुगलों या अन्य किसी शक्ति के सामने अपनी आन-बान से समझौता नहीं किया। वे अंत तक स्वाभिमानी बने रहे।
