सोनगरा चौहान - सुवर्णगिरी से मेवाड़-मारवाड़ तक
जालौर शासनकाल: लगभग 1181 ई. से 1311 ई. तक (विक्रम संवत 1238 से 1368)
कुल अवधि: लगभग 130 वर्ष

स्थापना की परंपरा

1181 (किर्तिपाल से जुड़ा उल्लेख)

प्रमुख ग्रंथ

कान्हड़दे प्रबंध (1455)

सोनगरा नाम की उत्पत्ति

चौहानों की जिस शाखा ने जालौर स्थित सुवर्णगिरी (सोनगिरी/सोनागिरी) दुर्ग पर लंबे समय तक शासन किया, वह उसी स्थान के नाम से “सोनगरा” कहलायी। यह दुर्ग सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था और जालौर क्षेत्र की राजनीतिक शक्ति का केंद्र माना जाता था। सोनगरा चौहान वंश ने इसी क्षेत्र से अपनी सत्ता, प्रशासन और सैन्य व्यवस्था का विस्तार किया। जालौर और सुवर्णगिरी दुर्ग न केवल उनकी राजधानी रहे, बल्कि उनकी पहचान, गौरव और ऐतिहासिक विरासत के प्रतीक भी बने। इस क्षेत्र में उनका शासन काल इतिहास में विशेष स्थान रखता है।

इतिहास की मुख्य समयरेखा

देश के अजय किलों में से एक — जालौर दुर्ग (सुवर्णगिरी)
राजपूती स्वाभिमान, शौर्य और बलिदान का अमर प्रतीक

क्या आप जानते हैं?

कहा जाता है—जब अखेराज सोनगरा को युद्ध का संदेश मिला, वे स्नान कर रहे थे। समाचार सुनते ही उन्होंने संदेशवाहक को अपने सोने के कड़े दान में दे दिए। यह प्रसंग बताता है कि क्षत्रिय परंपरा में धर्म-रक्षा हेतु बलिदान को “कर्तव्य” माना गया।

यह प्रसंग लोक-परंपरा/ख्यात में प्रचलित है।

विरासत स्थल

जालौर दुर्ग (सुवर्णगिरी)

जालौर दुर्ग, जिसे सुवर्णगिरी भी कहा जाता है, राजस्थान का एक प्रमुख ऐतिहासिक दुर्ग है। यह अरावली पर्वतमाला पर स्थित है और अपनी मजबूत संरचना, रणनीतिक महत्व तथा गौरवशाली इतिहास के लिए प्रसिद्ध है।

गिरी–सुमेल क्षेत्र

गिरी–सुमेल क्षेत्र राजस्थान का एक ऐतिहासिक व भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण इलाका है। यह अरावली पर्वतमाला में स्थित रहा और प्राचीन काल में दुर्गों, युद्धों तथा राजनैतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र माना जाता था।

गोगुंदा (राजतिलक प्रसंग)

अरावली की गोद में छिपा इतिहास उदयपुर से लगभग 40 किमी दूर अरावली की पहाड़ियों में बसा 'गोगुंदा' (Gogunda) एक छोटा सा कस्बा है, लेकिन इसका इतिहास बहुत बड़ा है। जब चित्तौड़गढ़ मुगलों के अधीन हो गया था, तब महाराणा उदयसिंह ने गोगुंदा को ही अपनी अस्थायी राजधानी और सुरक्षित ठिकाना बनाया था।