(स्वर्णगिरि के अजेय विजेता और सोनिगरा शौर्य के प्रतीक
परिचय
कीर्तिपाल चौहान, जिन्हें इतिहास में ‘कीतू’ के नाम से भी जाना जाता है, नाडोल के शासक अल्हण के पुत्र थे। वे एक महत्वाकांक्षी योद्धा और कुशल राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने राजस्थान के जालोर क्षेत्र में एक शक्तिशाली और स्वतंत्र राज्य की नींव रखी।
जालोर विजय और राज्य की स्थापना (1181 ई.)
कीर्तिपाल ने प्रारंभ में अपने पैतृक राज्य नाडोल के विस्तार में सहायता की, लेकिन वे अपना स्वयं का स्वतंत्र साम्राज्य स्थापित करना चाहते थे।
परमारों को पराजित करना: उस समय जालोर (जाबालिपुर) पर परमार शासकों का अधिकार था। कीर्तिपाल ने 1181 ईस्वी के आसपास परमारों को युद्ध में परास्त कर ‘सुवर्णगिरि’ (जालोर दुर्ग) पर अधिकार कर लिया।
सोनिगरा नाम का उदय: जालोर के किले को ‘स्वर्णगिरि’ या ‘सोनगढ़’ कहा जाता था। इसी कारण यहाँ शासन करने वाले चौहानों की शाखा ‘सोनिगरा चौहान’ कहलाई।
प्रमुख सैन्य उपलब्धियाँ
कीर्तिपाल सोनिगरा का शासन काल निरंतर संघर्ष और विस्तार का रहा:
मेवाड़ पर आक्रमण: कीर्तिपाल ने मेवाड़ के शासक सामंत सिंह को पराजित कर कुछ समय के लिए मेवाड़ के क्षेत्रों पर भी अधिकार कर लिया था। हालांकि, बाद में मेवाड़ के शासकों ने इसे पुनः प्राप्त कर लिया।
गुजरात के साथ संबंध: उन्होंने गुजरात के चालुक्यों के साथ भी कूटनीतिक और सैन्य संघर्ष जारी रखा ताकि अपने राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखा जा सके।
सांस्कृतिक और धार्मिक योगदान
कीर्तिपाल केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि कला और धर्म के संरक्षक भी थे:
उपाधि: प्रसिद्ध विद्वान मुहणोत नैणसी ने अपनी ख्यात में कीर्तिपाल के लिए “कीतू एक महान राजपूत” (कीतू एक अनखियौ हिंदू) शब्द का प्रयोग किया है, जो उनकी वीरता को दर्शाता है।
मंदिर निर्माण: उन्होंने अपने शासनकाल के दौरान जालोर में कई मंदिरों और सार्वजनिक निर्माण कार्यों को प्रोत्साहन दिया।
उत्तराधिकार और विरासत
कीर्तिपाल की मृत्यु के बाद उनके पुत्र समर सिंह गद्दी पर बैठे। कीर्तिपाल द्वारा स्थापित यह वंश आगे चलकर कान्हड़देव सोनिगरा जैसे महान नायक के समय अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा, जिन्होंने अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध वीरतापूर्वक युद्ध किया था।
संक्षेप में महत्वपूर्ण तथ्य
नाम: कीर्तिपाल चौहान (कीतू)
वंश: सोनिगरा चौहान
पिता: अल्हण (नाडोल के शासक)
स्थापना: जालोर का सोनिगरा राज्य (1181 ई.)
राजधानी: जालोर (जाबालिपुर)
प्रमुख दुर्ग: स्वर्णगिरि (जालोर दुर्ग)
विद्वता और साहित्यिक योगदान
महाराजा कीर्तिपाल सिंह जी सोनिगरा चौहान न केवल एक अजेय योद्धा थे, बल्कि वे कला, साहित्य और विद्वता के महान संरक्षक भी थे, जिनके शासनकाल में जालोर बौद्धिक और सांस्कृतिक प्रगति का केंद्र बना। उनकी प्रशासनिक दूरदर्शिता और चारित्रिक श्रेष्ठता से प्रभावित होकर ही विख्यात इतिहासकार मुहणोत नैणसी ने उन्हें “कीतू एक महान राजा” जैसी गौरवशाली उपाधि से नवाजा, जो उनकी विद्वता के प्रति साहित्यिक जगत के सम्मान को प्रकट करती है। उनके संरक्षण में जालोर के दुर्ग में विशाल ज्ञान भंडारों और जैन साहित्य का सृजन हुआ, साथ ही सुन्धा पर्वत शिलालेख जैसे ऐतिहासिक साक्ष्य उनकी काव्यमय प्रशंसा और परिष्कृत कलात्मक रुचि का जीवंत प्रमाण हैं।
कीर्तिपाल जी ने शस्त्र और शास्त्र के समन्वय से एक ऐसे साम्राज्य की नींव रखी, जहाँ शौर्य के साथ-साथ ज्ञान और धार्मिक सहिष्णुता को भी सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।
