महापराक्रमी कान्हड़देव सोनगरा

(जालौर का स्वाभिमान और अजेय योद्धा)

परिचय और राज्यारोहण

कान्हड़देव सोनगरा, जालौर के चौहान वंश (सोनगरा शाखा) के सबसे शक्तिशाली और प्रतापी शासक थे। वे राव सामंत सिंह के पुत्र थे।

  • शासन काल: उन्होंने लगभग 1296 ई. (वि.सं. 1353) में जालौर की गद्दी संभाली।
  • विस्तार: उनके समय में जालौर की शक्ति अपने चरम पर थी। उन्होंने अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया और पड़ोसी तुर्क आक्रमणकारियों को कई बार धूल चतौनी दी।

अलाउद्दीन खिलजी से संघर्ष के प्रमुख कारण

कान्हड़देव और दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के बीच युद्ध का कारण केवल साम्राज्य विस्तार नहीं, बल्कि धर्म और स्वाभिमान की रक्षा था।

  • गुजरात अभियान और रास्ता देने से इनकार (1298 ई.): जब अलाउद्दीन खिलजी की सेना गुजरात (सोमनाथ मंदिर) को लूटने जा रही थी, तो उन्होंने जालौर के रास्ते से गुजरने की अनुमति मांगी। कान्हड़देव ने यह कहकर मना कर दिया कि, “तुर्क मेरी धरती से गुजरें और मंदिरों को तोड़ें, यह मैं कभी बर्दाश्त नहीं करूँगा।”
  • सोमनाथ के शिवलिंग के टुकड़े छीनना: खिलजी की सेना (उलूग खां और नुसरत खां के नेतृत्व में) मेवाड़ के रास्ते गुजरात गई और सोमनाथ को लूटा। वापसी में वे जालौर के पास से गुजरे। जब कान्हड़देव को पता चला कि उनके पास सोमनाथ शिवलिंग के टुकड़े और बंदी बनाए गए हिंदू नागरिक हैं, तो उन्होंने (उनके सेनापति जेता देवड़ा के नेतृत्व में) तुर्क सेना पर अचानक हमला कर दिया।

परिणाम: राजपूतों ने शिवलिंग के टुकड़े छीन लिए (जिन्हें बाद में जालौर में स्थापित किया गया) और हजारों हिंदू कैदियों को मुक्त कराया। यह घटना खिलजी के अहंकार पर बहुत बड़ी चोट थी।

'हिंदू पति' की चुनौती (दिल्ली दरबार का प्रसंग)

इतिहासकार मुहणोत नैणसी के अनुसार, एक बार संधि के तहत कान्हड़देव दिल्ली दरबार गए थे। वहां अलाउद्दीन ने घमंड में कहा, “हिंदुस्तान में ऐसा कोई हिंदू राजा नहीं जो मेरा मुकाबला कर सके।” यह सुनकर कान्हड़देव का स्वाभिमान जाग उठा। उन्होंने भरी सभा में तलवार निकालकर कहा, “मैं तुम्हें युद्ध की चुनौती देता हूँ। अगर मैं हार गया तो शीश झुका दूँगा, पर यह घमंड नहीं सहूँगा।” इसी के बाद जालौर और दिल्ली के बीच अंतिम युद्ध की नींव पड़ी।

जालौर का ऐतिहासिक युद्ध और घेराबंदी (1305-1311 ई.)

अलाउद्दीन ने अपने सर्वश्रेष्ठ सेनापति कमलउद्दीन गुर्ग को विशाल सेना के साथ जालौर भेजा।

  • किले की मजबूती: जालौर का सुवर्णगिरी दुर्ग इतना मजबूत था कि दुश्मन सीधे आक्रमण करके उसे कभी नहीं जीत पाए। तुर्क सेना ने महीनों तक किले को घेरे रखा, लेकिन उन्हें प्रवेश का मार्ग नहीं मिला।
  • राई के भाव रातों रात गए: किले में प्रवेश का रास्ता खोजने के लिए तुर्कों ने राई (सरसों) का उपयोग किया (यह देखने के लिए कि दीवार में नमी कहाँ है)। उन्होंने मुंहमांगे दामों पर राई खरीदी। इसी घटना से यह कहावत बनी—“राई रा भाव तो राते ही गया” (अर्थात् अवसर निकल चुका है)।

विश्वासघात और वीरगति (जालौर का साका - 1311 ई.)

जब तुर्क सेना जीत नहीं पाई, तो उन्होंने छल का सहारा लिया।

  • गद्दार बीका दहिया: कान्हड़देव के एक सरदार बीका दहिया को लालच देकर तुर्कों ने अपनी ओर मिला लिया। बीका ने किले में प्रवेश करने का गुप्त और कच्चा रास्ता दुश्मनों को बता दिया।
  • देशभक्त पत्नी: जब बीका ने घर जाकर अपनी पत्नी को यह बताया, तो उस क्षत्राणी ने देशद्रोह करने वाले अपने पति को उसी समय मार डाला और जाकर राजा को खबर दी, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
  • साका और जौहर: 1311 ई. में तुर्क सेना किले में घुस गई। कान्हड़देव सोनगरा और उनके वीर साथियों ने भीषण युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की। रानियों ने जलते हुए अग्निकुंड में कूदकर जौहर किया।

साहित्यिक धरोहर

कान्हड़देव सोनगरा की वीरता का सबसे प्रामाणिक वर्णन कवि पद्मनाभ द्वारा रचित ग्रंथ ‘कान्हड़दे प्रबंध’ (1455 ई.) में मिलता है।

यह ग्रंथ राजस्थानी साहित्य की एक अनमोल धरोहर है, जो उस समय के युद्ध और संस्कृति का सजीव चित्रण करता है।