सोनगरा चौहान इतिहास — एक संक्षिप्त परिचय

जालौर से पाली और मेवाड़-मारवाड़ तक प्रभाव

राजसत्ता और दुर्ग — जालौर / सुवर्णगिरी

यह घटना केवल एक राजा का बदलना नहीं थी, बल्कि यह मेवाड़ और भारत के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ थी, जिसमें सोनगरा चौहानों (विशेषकर मानसिंह जी सोनगरा) ने केंद्रीय भूमिका निभाई थी।

वेबसाइट ड्राफ्ट: गोगुंदा और रक्तरंजित सिंहासन (महाराणा प्रताप राजतिलक प्रसंग, 1572 ई.)
परिचय: अरावली की गोद में छिपा इतिहास उदयपुर से लगभग 40 किमी दूर अरावली की पहाड़ियों में बसा ‘गोगुंदा’ (Gogunda) एक छोटा सा कस्बा है, लेकिन इसका इतिहास बहुत बड़ा है। जब चित्तौड़गढ़ मुगलों के अधीन हो गया था, तब महाराणा उदयसिंह ने गोगुंदा को ही अपनी अस्थायी राजधानी और सुरक्षित ठिकाना बनाया था। यही वह स्थान है जहाँ मेवाड़ के सबसे प्रतापी शासक, महाराणा प्रताप का पहला राजतिलक हुआ।

1.⁠ ⁠पृष्ठभूमि: उत्तराधिकार का संकट 28 फरवरी, 1572 ई. (होली का दिन) को गोगुंदा में महाराणा उदयसिंह का देहांत हो गया। मेवाड़ शोक में डूबा था, लेकिन इस शोक के साथ एक बहुत बड़ा राजनीतिक संकट भी खड़ा हो गया था।

पिता का निर्णय: महाराणा उदयसिंह ने अपनी प्रिय रानी धीरबाई (भटियाणी रानी) के प्रभाव में आकर अपने सबसे योग्य और बड़े पुत्र प्रताप सिंह की जगह छोटे पुत्र जगमाल को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।

मेवाड़ की जरूरत: उस समय मेवाड़ मुगलों के भीषण आक्रमणों से जूझ रहा था। ऐसे संकटकाल में मेवाड़ को जगमाल जैसे अनुभवहीन बालक की नहीं, बल्कि प्रताप जैसे तपे हुए योद्धा की जरूरत थी।

2.⁠ ⁠श्मशान का विद्रोह: सामंतों का निर्णय राजपूत परंपरा के अनुसार, नया राजा अपने पिता की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं होता था, वह सिंहासन पर बैठता था। जब महाराणा उदयसिंह की अर्थी श्मशान घाट (गोगुंदा के पास ‘महादेव बावड़ी’) ले जाई जा रही थी, तब प्रताप नंगे पैर अर्थी के साथ चल रहे थे, जबकि जगमाल गद्दी पर बैठने की तैयारी कर रहा था।

यह दृश्य मेवाड़ के स्वाभिमानी सरदारों से देखा नहीं गया। श्मशान घाट पर ही एक गुप्त मंत्रणा हुई। इस मंत्रणा का नेतृत्व दो प्रमुख स्तंभों ने किया:

रावत कृष्णदास चूंडावत (सलूंबर के रावत, जिन्हें मेवाड़ का राजा चुनने का वंशानुगत अधिकार था)।

मानसिंह जी सोनगरा (पाली/जालौर के सोनगरा वीर और महाराणा प्रताप के सगे मामा)।

3.⁠ ⁠मानसिंह सोनगरा की ऐतिहासिक भूमिका इस संकट की घड़ी में मानसिंह सोनगरा ने स्पष्ट रूप से कहा कि राजा का व्यक्तिगत स्नेह राज्य हित से बड़ा नहीं हो सकता। उन्होंने अपने भांजे प्रताप के अधिकार के लिए आवाज उठाई। उन्होंने और अन्य सरदारों ने तय किया कि वे उदयसिंह जी के गलत निर्णय को बदल देंगे, भले ही यह राजद्रोह लगे, लेकिन यह ‘राष्ट्रधर्म’ था।

4.⁠ ⁠राजतिलक का दृश्य: महादेव बावड़ी, गोगुंदा अंतिम संस्कार के तुरंत बाद, सभी सरदार वापस महल (राजमहल नहीं, बल्कि एक साधारण ठिकाना) लौटे। वहां जगमाल सिंहासन पर बैठा था।

सिंहासन परिवर्तन: रावत कृष्णदास चूंडावत और मानसिंह सोनगरा आगे बढ़े। उन्होंने जगमाल का हाथ पकड़कर उसे सम्मानपूर्वक (लेकिन दृढ़ता से) सिंहासन से नीचे उतारा और कहा, “मेवाड़ का सिंहासन वीरों का है, और इस पर बैठने का अधिकार केवल प्रताप का है।”

राजतिलक: उसी क्षण, गोगुंदा की ‘महादेव बावड़ी’ के पास एक चबूतरे पर प्रताप को बैठाया गया। रावत कृष्णदास चूंडावत ने अपनी कमर से कटार निकाली, अपने अंगूठे पर चीरा लगाया और रक्त से प्रताप का राजतिलक किया। (कुछ इतिहासकार रक्त तिलक को प्रतीकात्मक मानते हैं, लेकिन यह घटना की गंभीरता को दर्शाता है)।

जयकारे: मामा मानसिंह सोनगरा ने सबसे पहले तलवार म्यान से निकालकर नए महाराणा को सलामी दी। गोगुंदा की पहाड़ियाँ “महाराणा प्रताप की जय” के नारों से गूंज उठीं।

5.⁠ ⁠महत्व और परिणाम यह राजतिलक किसी उत्सव के माहौल में नहीं, बल्कि शोक और संकट के बीच हुआ था (इसे ‘शोकलीन राजतिलक’ भी कहते हैं)। जगमाल नाराज होकर अकबर की शरण में चला गया।

गोगुंदा का यह राजतिलक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि उस दिन मानसिंह सोनगरा और अन्य सरदार हस्तक्षेप न करते, तो शायद जगमाल मुगलों से संधि कर लेता और मेवाड़ का स्वाभिमान हमेशा के लिए समाप्त हो जाता।

वेबसाइट के लिए विशेष बॉक्स: ‘सोनगरा संबंध’
मामा का फर्ज और राष्ट्रधर्म गोगुंदा के राजतिलक में अखेराज जी सोनगरा के पुत्र और प्रताप के मामा मानसिंह सोनगरा की भूमिका यह सिद्ध करती है कि सोनगरा चौहानों के लिए कुल और राष्ट्र का हित सर्वोपरि था। उन्होंने सगे भांजे का पक्ष केवल रिश्तेदारी के कारण नहीं, बल्कि उसकी योग्यता और मेवाड़ के भविष्य को देखते हुए लिया था।

प्रतिरोध और बलिदान — 1311 साका, परंपरा

“मामा लाजै भाटिया, कुल लाजै चहुंवाण। जौ मैं परणूं तुर्कणी, तो पश्चिम उगै भाण।।” (अर्थात: वीरमदेव कहते हैं कि यदि मैं तुर्क राजकुमारी से विवाह करूँ तो मेरे ननिहाल (भाटी) और मेरे कुल (चौहान) दोनों लज्जित होंगे। यह तभी संभव है जब सूर्य पश्चिम से उगने लगे।)

1.⁠ ⁠प्रतिरोध की पृष्ठभूमि (The Resistance) 14वीं सदी की शुरुआत में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की विस्तारवादी नीति पूरे भारत को रौंद रही थी। रणथंभौर और चित्तौड़गढ़ के बाद उसकी नजर अजेय दुर्ग जालौर पर थी।

स्वाभिमान का टकराव: यह युद्ध केवल राज्य बचाने का नहीं, बल्कि धर्म और संस्कृति को बचाने का था। जालौर के शासक कान्हड़देव सोनगरा और उनके वीर पुत्र वीरमदेव ने खिलजी की अधीनता स्वीकार करने के बजाय युद्ध को चुना। उन्होंने स्पष्ट कह दिया था कि “राजपूत सिर कटा सकता है, लेकिन झुका नहीं सकता।”

2.⁠ ⁠विश्वासघात और दुर्ग का पतन अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी विशाल सेना और अपने सेनापति कमालुद्दीन गुर्ग को जालौर भेजा। महीनों तक घेराबंदी चली, लेकिन ‘सुवर्णगिरी’ का फाटक नहीं खुला।

बीका दहिया का विश्वासघात: जब शक्ति से काम नहीं चला, तो खिलजी ने छल का सहारा लिया। दुर्ग के एक रक्षक बीका दहिया को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया गया। बीका ने दुश्मनों को किले में घुसने का वह गुप्त रास्ता बता दिया जहाँ की दीवार कच्ची थी।

वीरांगना पत्नी: कहा जाता है कि जब बीका ने घर जाकर अपनी पत्नी को इस गद्दारी के बारे में बताया, तो उस क्षत्राणी ने सोते हुए अपने पति को मार डाला ताकि गद्दारी का वंश आगे न बढ़े, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

3.⁠ ⁠1311 का साका: अग्निस्नान और केसरिया (The Sacrifice) जब तुर्की सेना किले में घुस आई, तो सोनगरा वीरों ने समझ लिया कि अब अंतिम समय आ गया है। यहीं से ‘साका’ की पवित्र परंपरा का निर्वाह हुआ।

जौहर (Jauhar): राजपूती मान-मर्यादा की रक्षा के लिए रानियों और वीरांगनाओं ने “जय आशापुरा माँ” के जयकारे लगाते हुए धधकती चिताओं में प्रवेश किया। इसे अग्निस्नान कहा गया। सुवर्णगिरी की हवा में पवित्र धुएं की महक थी।

केसरिया (Kesariya): जौहर की लपटें देखकर कान्हड़देव और वीरमदेव ने अपने साथियों के साथ केसरिया बाना (भगवा वस्त्र) धारण किया। किले के दरवाजे खोल दिए गए और भूखे शेरों की तरह मुट्ठी भर राजपूत खिलजी की हजारों की सेना पर टूट पड़े।

अंत: कान्हड़देव सोनगरा लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। 1311 ई. में जालौर का पतन हुआ, लेकिन यह पराजय नहीं, बल्कि एक अमर बलिदान था।

4.⁠ ⁠वीरमदेव और कुल की परंपरा (The Legacy) इस साके का सबसे मर्मस्पर्शी पहलू राजकुमार वीरमदेव सोनगरा का बलिदान है।

मान्यता है कि वीरमदेव का कटा हुआ सिर जब दिल्ली दरबार में ले जाया गया और सुल्तान की बेटी (फिरोजा) ने उसे थाली में रखकर देखा, तो उस कटे हुए सिर ने भी अपना मुंह फेर लिया।

यह घटना सोनगरा चौहानों की उस महान परंपरा का प्रतीक है कि “प्राण चले जाएं, लेकिन सिद्धांत और स्वाभिमान नहीं जाना चाहिए।”

5.⁠ ⁠सोनगरा परंपरा: आज का महत्व 1311 का साका हमें सिखाता है कि:

वचनबद्धता: सोनगरा अपने वचन के पक्के होते हैं।

मातृभूमि प्रेम: अपनी धरती के लिए सर्वस्व न्योछावर करना।

शरणागत रक्षा: अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए किसी भी महाशक्ति से टकरा जाना।

वेबसाइट के लिए ‘फैक्ट फाइल’ (Fact File):
शासक: राव कान्हड़देव सोनगरा

वीर पुत्र: वीरमदेव सोनगरा

आक्रमणकारी: अलाउद्दीन खिलजी (सेनापति कमालुद्दीन गुर्ग)

वर्ष: 1311 ई. (विक्रम संवत 1368)

परिणाम: जालौर का पतन और ऐतिहासिक साका।

प्रसिद्ध कहावत: “राई रा भाव तो रात ही गया” (यह कहावत इसी युद्ध के दौरान बनी, जब दुश्मनों ने रातों-रात दीवार की मजबूती जांचने के लिए मुंह मांगे दाम पर राई खरीदी थी)।