गिरी-सुमेल: वह युद्ध जहाँ मुट्ठी भर राजपूतों ने दिल्ली सल्तनत की नींव हिला दी
बोलियो सूरी राज यूं, गिरी घाट घमसाण।
मुट्ठी खातर बाजरी, खो देतो हिंदवाण।।
(शेरशाह सूरी का कथन: “मैं एक मुट्ठी बाजरे (मारवाड़) के लिए पूरे हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता।”)
परिचय और भौगोलिक स्थिति
राजस्थान के पाली जिले की जैतारण तहसील में दो गाँव हैं—गिरी और सुमेल। इन दोनों गाँवों के मध्य फैला हुआ मैदान भारतीय इतिहास के सबसे भीषण और रोमांचक युद्धों में से एक का साक्षी है।
यह युद्ध 5 जनवरी, 1544 ई. (विक्रम संवत 1600, पौष सुदी 11) को लड़ा गया था।
युद्ध की पृष्ठभूमि
1540 के दशक में मारवाड़ के शासक राव मालदेव अपनी शक्ति के चरम पर थे। उनकी सीमाएँ दिल्ली और आगरा के निकट पहुँच चुकी थीं। अफगान बादशाह शेरशाह सूरी जानता था कि यदि मालदेव को नहीं रोका गया, तो भारत पर राजपूतों का शासन होगा। शेरशाह ने 80,000 की विशाल सेना और भारी तोपखाने के साथ मारवाड़ पर चढ़ाई की।
शेरशाह का छल
शेरशाह की सेना एक महीने तक गिरी-सुमेल के मैदान में पड़ी रही, लेकिन राजपूतों पर हमला करने का साहस नहीं जुटा पाई। अंत में, उसने छल का सहारा लिया।
- उसने जाली पत्र (Forged Letters) लिखवाए, जिनमें लिखा था कि राव मालदेव के सेनापति (जेता, कुंपा और अखेराज) शेरशाह से मिल गए हैं।
- ये पत्र राव मालदेव के शिविर में गिरा दिए गए।
- राव मालदेव को संदेह हो गया और वे 4 जनवरी की रात अपनी मुख्य सेना लेकर जोधपुर लौट गए।
स्वाभिमान का निर्णय: कलंक या बलिदान?
जब जेता, कुंपा और पाली नरेश अखेराज जी सोनगरा को पता चला कि उनके स्वामी उन्हें ‘गद्दार’ समझकर चले गए हैं, तो उन्हें गहरा आघात लगा।
- अखेराज सोनगरा की हुंकार: सोनगरा और राठौड़ सरदारों ने तय किया कि वे मैदान छोड़कर नहीं जाएंगे। उन्होंने कसम खाई— “यह कलंक अब हमारे रक्त से ही धुलेगा।”
एक तरफ शेरशाह की 80,000 की सेना थी, और दूसरी तरफ केवल 8,000 से 10,000 राजपूत वीर।
कार्यकारिणी समिति - कार्यकारिणी
सूर्योदय के साथ ही राजपूत वीरों ने “हर-हर महादेव” और “जय आशापुरा माँ” के जयकारे लगाते हुए अफगान सेना पर ऐसा भीषण प्रहार किया कि दुश्मन के पैर उखड़ गए।
- इतिहासकार अब्बास खान सरवानी (तारीख-ए-शेरशाही) लिखता है कि राजपूत अपनी घोड़ों से उतरकर, दोनों हाथों में तलवारें लिए पागलों की तरह लड़ रहे थे।
- शेरशाह सूरी अपनी मौत को सामने देखकर इतना डर गया कि युद्ध के बीच में ही नमाज पढ़ने बैठ गया और अपनी जान की दुआ मांगने लगा।
राजपूत जीतने ही वाले थे कि अंत में शेरशाह का सेनापति जलाल खान एक नई आरक्षित सेना (Reserve Army) लेकर आ गया, जिसने थके हुए राजपूत वीरों को घेर लिया।
अखेराज जी सोनगरा का बलिदान
इस युद्ध में पाली के शासक अखेराज जी सोनगरा (रोटे राव) ने अद्भुत शौर्य का परिचय दिया। वे राव मालदेव के ससुर और सबसे विश्वसनीय सहयोगी थे। उन्होंने अपने पुत्र भोजराज सोनगरा और 22 प्रमुख सोनगरा सरदारों के साथ अंतिम सांस तक युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की।
यह युद्ध सिद्ध करता है कि सोनगरा चौहानों के लिए ‘वचन’ और ‘स्वाभिमान’ जीवन से बढ़कर था।
परिणाम और स्मारक
हालाँकि शेरशाह यह युद्ध जीत गया, लेकिन उसकी सेना इतनी बुरी तरह नष्ट हुई कि वह आगे जोधपुर पर कब्जा बनाए नहीं रख सका।
वीरों का बड़ (शहीद स्मारक): आज भी गिरी-सुमेल रणक्षेत्र में उन वीरों की याद में छतरियां और स्मारक बने हुए हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘वीरों का बड़’ कहा जाता है। यहाँ हर साल भव्य मेला लगता है।
फैक्ट विवरण
विवरण | जानकारी |
युद्ध का नाम | गिरी-सुमेल का युद्ध (Battle of Sammel) |
तिथि | 5 जनवरी, 1544 ई. |
स्थान | जैतारण, जिला पाली (राजस्थान) |
प्रमुख सोनगरा वीर | अखेराज जी सोनगरा (पाली), कुंअर भोजराज सोनगरा |
विपक्ष | शेरशाह सूरी (अफ़ग़ान सेना) |
विशेषता | 10 गुना बड़ी सेना को राजपूतों ने लगभग हरा दिया था। |
मुख्य नेतृत्व और प्रमुख पात्र
कीर्तिपाल सोनगरा
संस्थापक चरण
कान्हड़देव सोनगरा
जालौर का स्वाभिमान
वीरमदेव सोनगरा
साका की अमर कथा
अखेराज सोनगरा
पाली अध्याय / दानवीरता
मानसिंह सोनगरा
मेवाड़ के “किंगमेकर” प्रसंगों में उल्लेख
