पराक्रमी क्षत्रिय श्री वीरमदेव सोनगरा जी

(शौर्य और धर्म रक्षा का अद्वितीय उदाहरण)

परिचय

वीरमदेव सोनगरा जालौर के प्रतापी शासक राव कान्हड़देव सोनगरा के पुत्र थे। वे अपने पिता की तरह ही एक महान योद्धा, मातृभूमि भक्त और स्वाभिमानी राजकुमार थे। उनका संघर्ष दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के साथ हुआ, जो राजस्थानी इतिहास में “जालौर का साका” (1311 ई.) के नाम से प्रसिद्ध है।

दिल्ली दरबार और फिरोजा का प्रेम प्रसंग

इतिहासकार पद्मनाभ द्वारा रचित ग्रंथ ‘कान्हड़दे प्रबंध’ और ‘नैणसी री ख्यात’ में एक बहुत प्रसिद्ध घटना का वर्णन मिलता है:

  • एक बार संधि प्रस्ताव के तहत वीरमदेव को दिल्ली दरबार में जाना पड़ा। वहाँ उनका तेजस्वी रूप और मल्ल-युद्ध (कुश्ती) कौशल देखकर अलाउद्दीन खिलजी की पुत्री शहजादी फिरोजा उन पर मोहित हो गई।
  • फिरोजा ने अपने पिता अलाउद्दीन से हठ किया कि वह विवाह केवल वीरमदेव से ही करेगी।
  • अलाउद्दीन ने वीरमदेव के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे एक “तुर्क” से विवाह करना अपनी कुल मर्यादा के खिलाफ मानकर वीरमदेव ने ठुकरा दिया और चालकी से वापस जालौर लौट आए।

वीरमदेव की प्रसिद्ध प्रतिज्ञा

जब अलाउद्दीन का दबाव बढ़ा, तो वीरमदेव ने एक दोहा कहा जो आज भी राजपूती शान का प्रतीक है:

“मामा लाजे भाटिया, कुल लाजे चहुआण। जे मैं परणु तुरकणी, तो पश्चिम उगे भाण ||”

(अर्थात्: यदि मैं तुर्कनी से विवाह करूँ तो मेरे मामा (भाटी वंश) लज्जित होंगे और मेरा चौहान कुल कलंकित होगा। ऐसा तभी संभव है जब सूर्य पश्चिम से उगे।)

जालौर का युद्ध और विश्वासघात

विवाह प्रस्ताव ठुकराने और अलाउद्दीन की विस्तारवादी नीति के कारण खिलजी ने जालौर पर विशाल सेना के साथ आक्रमण कर दिया।

  • घेराबंदी: तुर्की सेना ने कई सालों तक किले को घेरे रखा लेकिन उसे जीत नहीं पाई।
  • विश्वासघात: अंत में, बीका दहिया नामक एक विश्वासघाती राजपूत ने लालच में आकर दुश्मनों को किले में घुसने का गुप्त रास्ता बता दिया (जिसे बाद में उसकी पत्नी ने ही मार दिया था)।

वीरमदेव का बलिदान और चमत्कार

1311 ई. में जालौर का साका हुआ:

  • राव कान्हड़देव और वीरमदेव ने अंतिम सांस तक युद्ध किया।
  • वीरमदेव युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए (कुछ स्रोतों के अनुसार, उन्होंने शत्रु के हाथ न आने के लिए ‘आशापुरा माता’ के सामने कटार भोंक कर आत्मबलिदान दे दिया)।
  • चमत्कार: कहा जाता है कि जब वीरमदेव का कटा हुआ शीश (सिर) दिल्ली ले जाकर फिरोजा के सामने थाल में रखा गया, तो वह शीश फिरोजा की तरफ से घूम गया (मुंह फेर लिया)। यह देख फिरोजा ने कहा कि “तने जीते जी नहीं देखा, तो अब क्या देखेगा?” और दुखी होकर यमुना नदी में कूदकर जान दे दी।

निष्कर्ष

वीरमदेव सोनगरा का जीवन हमें सिखाता है कि “प्राण जाए पर वचन और धर्म न जाए”

22-25 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने जो त्याग किया, वह उन्हें इतिहास में अमर बना गया। आज भी जालौर के सुवर्णगिरी दुर्ग का कण-कण उनकी गाथा गाता है।