(पाली के शासक और मेवाड़-मारवाड़ के रक्षक)
परिचय एवं पृष्ठभूमि
- वंश: प्रसिद्ध चौहान वंश की वीर परंपरा।
- पिता: पाली के शासक रणधीर।
- व्यक्तित्व: अखेराज सोनगरा अपने समय के कुशल राजनीतिज्ञ, महान योद्धा और बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे।
कूटनीतिक महत्व और वैवाहिक संबंध
अखेराज सोनगरा का उस काल में विशिष्ट स्थान था, जिसकी पुष्टि उनके वैवाहिक संबंधों से होती है:
- उनके मारवाड़, मेवाड़ और बीकानेर के राजघरानों से घनिष्ठ संबंध थे।
- मेवाड़ से रिश्ता: उन्होंने अपनी पुत्री (महारानी जयवंता बाई) का विवाह मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह के साथ किया।
- प्रभाव: इस विवाह के फलस्वरूप महाराणा उदयसिंह को मेवाड़ के सामंतों के साथ-साथ चौहानों और मारवाड़ का समर्थन भी स्वतः प्राप्त हो गया।
अनसुने प्रसंग और लोक-मान्यताएँ
इतिहास के पन्नों में दर्ज वीरगाथाओं के अलावा, अखेराज सोनगरा के जीवन से जुड़े कुछ ऐसे प्रसंग भी हैं जो तत्कालीन सामाजिक मर्यादाओं और लोक-विश्वास को दर्शाते हैं। इसमें ‘थाली का प्रसंग’ ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब दासी पुत्र बनवीर ने कुंवर उदयसिंह की पहचान को लेकर दुष्प्रचार किया, तब मेवाड़ के उमरावों ने उदयसिंह के साथ ‘एक थाली में भोजन’ करके उनके असली होने की पुष्टि की। इस सामाजिक स्वीकृति के बाद ही अखेराज सोनगरा ने निश्चिंत होकर अपनी पुत्री का विवाह उदयसिंह से किया, जिसने मेवाड़ की गद्दी की बहाली में निर्णायक भूमिका निभाई।
एक अन्य लोकमान्यता अखेराज जी की ठकुरानियों के सती होने के संदर्भ में भी प्रचलित है। कहा जाता है कि युद्ध में उनके वीरगति पाने के तुरंत बाद वे सती नहीं हुई थीं। लगभग छह माह बाद, जब एक भाट ने उन्हें वीर रस का एक दोहा सुनाया, तब क्षत्राणी धर्म और ‘सत’ जागृत होने पर उन्होंने सतीत्व का मार्ग अपनाया। साथ ही, अखेराज जी अपनी दानवीरता और हठ के लिए ‘रोटे राव’ (Rote Rao) के नाम से भी प्रसिद्ध थे और उन्होंने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सुगनावली’ राव मालदेव के विशेष आग्रह पर लिखा था।
मेवाड़ की स्वतंत्रता में योगदान (माहोली का युद्ध)
जब दासी पुत्र बनवीर ने मेवाड़ की गद्दी हथिया ली थी, तब अखेराज सोनगरा ने निर्णायक भूमिका निभाई:
- चूंकि वे राव मालदेव के समय पाली के महत्वपूर्ण शासक थे, इसलिए मारवाड़ की सेना का सहयोग मिला।
- मारवाड़ के प्रसिद्ध वीर जैता और कूम्पा सेना लेकर अखेराज के साथ आए।
- माहोली का युद्ध: माहोली के निकट घमासान युद्ध हुआ, जिसमें बनवीर हारकर भाग गया।
- परिणाम: पाली, मेवाड़ और मारवाड़ की संयुक्त सेना ने चित्तौड़ पर अधिकार कर महाराणा उदयसिंह को पुनः राजगद्दी पर बैठाया।
सुमेल गिरी का युद्ध और अद्वितीय बलिदान
शेरशाह सूरी के आक्रमण के समय (वि.सं. 1600, पौष शुक्ला 11) अखेराज जी की वीरता का परिचय मिलता है:
- युद्ध का बुलावा: जब राव कूम्पा ने शेरशाह की चढ़ाई की खबर भेजी, तब अखेराज स्नान कर रहे थे। युद्ध और प्राणोत्सर्ग (बलिदान) का अवसर जानकर वे इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने बधाई के रूप में संदेशवाहक (रेबारी) को अपने सोने के कड़े दे दिए।
- रणभूमि की ओर: वे अपने पुत्र भाण सोनगरा और सैन्य दल के साथ सुमेल गिरी पहुंचे।
- अंतिम संघर्ष: षड्यंत्र की आशंका से जोधपुर के राव मालदेव मैदान छोड़ गए, लेकिन अखेराज, जैता, कूम्पा और खींवकरण जैसे वीरों ने पीछे हटने से मना कर दिया।
- वीरगति: अखेराज शेर की तरह दहाड़ते हुए शत्रु सेना पर टूट पड़े। कहा जाता है कि अफीम-पान के बाद उनकी हुंकार से शत्रु कांप उठते थे और साथियों का मनोबल बढ़ता था। अंततः अपने पुत्र भोजराज और 21 अन्य सोनगरा वीरों के साथ लड़ते हुए उन्होंने वीरगति प्राप्त की।
शेरशाह सूरी का प्रसिद्ध कथन
इस युद्ध में राजपूतों के भयानक प्रहार और अपनी सेना के नुकसान को देखकर शेरशाह सूरी ने कहा था:
“बोल्यो सूरी बैण यूँ, गिरी घाट घमसाण। मूठी खातर बाजरी, खो देतो हिंदवाण ||”
(अर्थात्: मैं मुट्ठी भर बाजरे [मारवाड़ की बंजर भूमि] के लिए पूरे हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता।)
विद्वता और साहित्यिक योगदान
अखेराज सोनगरा केवल तलवार के ही धनी नहीं थे, बल्कि वे शकुन विद्या के भी ज्ञाता थे।
ग्रंथ की रचना: उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर “सुगनावली” नामक ग्रंथ की रचना की।
विषय: इसमें शकुन देखने की विधि, दिशा ज्ञान, युद्ध प्रयाण, राजा से भेंट, कर्मचारियों की नियुक्ति, अकाल-सुकाल, और वस्तुओं के मूल्य आदि विषयों पर शकुनों की जानकारी सरल भाषा में दी गई है।
